" ADHYATMIK GYAAN-आध्यात्मिक ज्ञान -हिन्दू धर्म के नीति नियम और शास्त्रों के बारे में जानने के लिए आपका मेरे ब्लॉग में स्वागत है "
Thursday, November 12, 2020
घर मे कौनसे पौधे नही लगाने चाहिए
यत्र निष्पाववल्लरी।
ब्रह्मवृक्षश्च यात्रास्ति,
सभार्यस्त्वं समविश।।46
बहुला कदली यत्र,
सभार्यस्त्वं समविश।
तालं तमालं भल्लातं ,
तित्तिण्डीखंडमेव च।।49
कदम्बाः खादिरं वापि,
सभार्यस्त्वं समविश।
न्यग्रोध वा गृहे येषा-
मश्वत्थं चूतमेव वा।।50
उदुम्बर वा पनसं,
सभार्यस्त्वं समाविश।
यस्य काकगृहं निम्बे,
आरामे वा गृहे$पि वा।।51
जिस घर में काटे दार वृक्ष वल्लरी(सेम), पलास या छेवक का वृक्ष अगस्त्य ,आक ,दूधवाले वृक्ष , करवीर (कनेर), अजमोदा ,नीम, जटामासी, नील केला ,ताल,तमाल इमली ,भिलावा,कदम, खैर, वरगद,पीपल, आम,गूलर(ऊमर),कटहल, के वृक्ष हो और जिनके घर में या बगीचे में कौवों का निवास हो और जिस घर में काली, कंकाली, डाकिनी ,प्रेत और भैरव की मूर्ती हो उस घर में दुःसह मुनि और उनकी पत्नि ज्येष्ठ या अलक्ष्मी का सदा निवास रहने से घर में हमेशा कलह और दरिद्रता बानी रहती है अतएव घर में ऊपर बताये गए वृक्षऔर विशालकाय वृक्ष न लगाएं और न ही ऊपर बताये गयी रौद्र रूप वाली मूर्तियों की स्थापना करे।
(सन्देश बहुत बड़ा न हो इसलिए पूरे श्लोक नहीं लिखे गए हैं)
The house where the cut tree Vallari (beans), Palas or Chhavek tree Agastya, Aak, milkweed tree, Karvir (Kaner), Ajmoda, Neem, Jatamasi, Neel banana, Tal, Tamal tamarind, Bhilava, Kadam, Khair, Vargad, A tree of peepal, mango, sycamore, jackfruit, and the house of crows in the house or garden, and the house which has idols of Kali, Kankali, Dakini, Phantom and Bhairav, in that house, sadhu muni and his wife eldest Or there is always discord and poverty in the house due to the constant residence of Alakshmi Therefore, do not plant the tree and giant tree mentioned above in the house, nor do you install the statues of the above mentioned form of rage. (The message should not be very large, so entire verses are not written)
श्री लिंग पुराण
उत्तर भाग, अध्याय-6
श्लोक-46 से 51
सादर नमस्कार
देव ब्रत चतुर्वेदी-पन्ना(मप्र)
Friday, September 4, 2020
हनुमानजी का तेज
जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,,
की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,,उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,,
और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,,
सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस (वरदान द्वारा प्राप्त) पुत्र हैं,,
और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,,
बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,,
उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,,
जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,,
रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,,
अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,,
और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,,
अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,,
हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,,
अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,,
एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,,
और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो,,
है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,,
जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,,
इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,,
संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,,
बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,,
और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,,
( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,,
हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो,
फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,,
अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,,
इससे तुम्हे क्या मिलेगा,,
तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,,
क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,,
उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,,
इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,,
और राम नाम का जाप कर,,
इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,,
और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,,
इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,,
जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,,
और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,,
जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,,
और जिस राम की तू बात कर रहा है,
वो है कौन,
और केवल तू ही जानता है राम के बारे में,
मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना,
और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,,
हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,,
उनकी महिमा अपरंपार है,
ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,,
बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,,
मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,,
बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,,
हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,,
तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,,
पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,,
बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,,
हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,,
बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,,
अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,,
तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,,
हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,,
ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,,
मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,,
और युद्ध के लिए न जाओ,
हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,,
बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,,
परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,,
और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,,
जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,,
अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,,
तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,,
पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,,
केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,,
बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,,
युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,,
हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,,
उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,,
और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,,
पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,,
हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,,
बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,,
ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,,
उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,,
बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,,
बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे,
उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया,
बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,,
उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,,
बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,,
तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,
बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,,
वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,,
सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,,
कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है,
हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,,
फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ,
मुझे कुछ समझ नही आया,,
ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,,
बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,,
ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,,
पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,,
ब्रम्हा जो बोले- हे बाली,
मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,,
पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,,
सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,,
इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,,
और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,,
ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,,
क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,,
ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,,
मुझे क्षमा करें,,
और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और आगे चलकर अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया ।
(Copy/Paste)
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Thursday, August 20, 2020
किस शंख के कया लाभ
*किस शंख के क्या लाभ जानिए?*
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क्या शंख हमारे सभी प्रकार के कष्ट दूर कर सकता है? भूत-प्रेत और राक्षस भगा सकता है? क्या शंख में ऐसी शक्ति है कि वह हमें धनवान बना सकता है? क्या शंख हमें शक्तिशाली व्यक्ति बना सकता है? पुराण कहते हैं कि सिर्फ एकमात्र शंख से यह संभव है। शंख की उत्पत्ति भी समुद्र मंथन के दौरान हुई थी।
शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है। शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है।
शंख के नाम से कई बातें विख्यात है जैसे योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती है, तो आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंक लिपि भी हुआ करती थी। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।
शंख से वास्तुदोष ही दूर नहीं होता इससे आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर होती है। इसके अलावा शंख कई चमत्कारिक लाभ के लिए भी जाना जाता है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं।
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे।
नमित: सर्वदेवैश्य पाञ्चजन्य नमो स्तुते।।
वर्तमान समय में शंख का प्रयोग प्राय: पूजा-पाठ में किया जाता है। अत: पूजारंभ में शंखमुद्रा से शंख की प्रार्थना की जाती है। शंख को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया माना गया है। शंख कई प्रकार के होते हैं। शंख के चमत्कारों और रहस्य के बारे में पुराणों में विस्तार से लिखा गया है।
शंख और शंख ध्वनि के रहस्य..
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पहला रहस्य👉 शंख के प्रकार : शंख के प्रमुख 3 प्रकार होते हैं:- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इन शंखों के कई उप प्रकार होते हैं। शंखों की शक्ति का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। यह प्रकार इस तरह भी है- वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख।
शंख के अन्य प्रकार👉 लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, गोमुखी शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि प्रकार के होते हैं।
द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत:
दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते
यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्
द्वितीय रहस्य👉 शंख दो प्रकार के होते हैं:- दक्षिणावर्ती एवं वामावर्ती। लेकिन एक तीसरे प्रकार का भी शंख पाया जाता है जिसे मध्यावर्ती या गणेश शंख कहा गया है।
* दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है।
* वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं।
* दक्षिणावर्ती शंख के प्रकार : दक्षिणावर्ती शंख दो प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है।
* दक्षिणावर्ती शंख पूजा : दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। शंख का पूजन केसर युक्त चंदन से करें। प्रतिदिन नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शंख की धूप-दीप-नैवेद्य-पुष्प से पूजा करें और तुलसी दल चढ़ाएं।
प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन- सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है। प्रतिदिन पूजन के बाद 108 बार या श्रद्धा के अनुसार मंत्र का जप करें।
तीसरा रहस्य👉 विविध नाम : शंख, समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव, महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पांचजन्य, अर्णवभव आदि।
चौथा रहस्य👉 महाभारत यौद्धाओं के पास शंख : महाभारत में लगभग सभी यौद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से कुछ यौद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे। जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।-महाभारत
अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। कई देवी देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन हेतु शंख नाद किया गया था।
अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है।
अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया जाता था। श्रीकृष्ण का ‘पांचजन्य’ नामक शंख तो अद्भुत और अनूठा था, जो महाभारत में विजय का प्रतीक बना।
पांचवां रहस्य👉 नादब्रह्म : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।
छठा रहस्य👉 धन प्राप्ति में सहायक शंख : शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है।
*यदि मोती शंख को कारखाने में स्थापित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है।
*यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है।
*मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज 'ॐ श्री महालक्ष्मै नम:' 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।
इसी तरह प्रत्येक शंख से अलग अलग लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
सातवां रहस्य👉 शंख पूजन का लाभ : शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं।
आठवां रहस्य👉 सेहत में फायदेमंद शंख : शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।
शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।
पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।
नौवां रहस्य.👉 सबसे बड़ा शंख : विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।
दसवां रहस्य👉 श्रेष्ठ शंख के लक्षण:-
शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ:
अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:
अर्थात् निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समानवाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात् मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणोंवाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।
ग्यारहवां रहस्य👉 शंख से वास्तु दोष का निदान : शंख से वास्तु दोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।
बारहवां रहस्य👉 गणेश शंख: इस शंख की आकृति भगवान श्रीगणेश की तरह ही होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।
*अन्नपूर्णा शंख : अन्नपूर्णा शंख का उपयोग घर में सुख-शान्ति और श्री समृद्धि के लिए अत्यन्त उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।
*कामधेनु शंख : कामधेनु शंख का उपयोग तर्क शक्ति को और प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
*मोती शंख : इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें और प्रतिदिन पूजन करें, लाभ मिलेगा।
ऐरावत शंख : ऐरावत शंख का उपयोग मनचाही साधना सिद्ध को पूर्ण करने के लिए, शरीर की सही बनावट देने तथा रूप रंग को और निखारने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डाल कर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24 - 28 घण्टे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें, तो चेहरा कांतिमय होने लगता है।
*विष्णु शंख : इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है।
*पौण्ड्र शंख : पौण्ड्र शंख का उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे विद्यार्थियों को अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।
*मणि पुष्पक शंख : मणि पुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।
*देवदत्त शंख : इसका उपयोग दुर्भाग्य नाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
*दक्षिणावर्ती शंख : इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देव स्वरूप माना गया है।
दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख पेट के रोग में भी बहुत लाभदायक है। विशेष कार्य में जाने से पहले दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने भर से उस काम के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।।
समस्त पाप नाशक स्त्रोत
*समस्त पापनाशक स्तोत्र-*
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
भगवान वेदव्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों में से एक ‘अग्नि पुराण’ में अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को दिये गये विभिन्न उपदेश हैं।
*इसी के अंतर्गत इस पापनाशक स्तोत्र के बारे में महात्मा पुष्कर कहते हैं कि मनुष्य चित्त की मलिनतावश चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन आदि विभिन्न पाप करता है, पर जब चित्त कुछ शुद्ध होता है तब उसे इन पापों से मुक्ति की इच्छा होती है। उस समय भगवान नारायण की दिव्य स्तुति करने से समस्त पापों का प्रायश्चित पूर्ण होता है। इसीलिए इस दिव्य स्तोत्र का नाम *'समस्त पापनाशक स्तोत्र’* है।
निम्निलिखित प्रकार से भगवान नारायण की स्तुति करें-
पुष्करोवाच विष्णवे विष्णवे नित्यं विष्णवे नमः। नमामि विष्णुं चित्तस्थमहंकारगतिं हरिम्।। चित्तस्थमीशमव्यक्तमनन्तमपराजितम्। विष्णुमीड्यमशेषेण अनादिनिधनं विभुम्।। विष्णुश्चित्तगतो यन्मे विष्णुर्बुद्धिगतश्च यत्। यच्चाहंकारगो विष्णुर्यद्वष्णुर्मयि संस्थितः।। करोति कर्मभूतोऽसौ स्थावरस्य चरस्य च। तत् पापं नाशमायातु तस्मिन्नेव हि चिन्तिते।। ध्यातो हरति यत् पापं स्वप्ने दृष्टस्तु भावनात्। तमुपेन्द्रमहं विष्णुं प्रणतार्तिहरं हरिम्।। जगत्यस्मिन्निराधारे मज्जमाने तमस्यधः। हस्तावलम्बनं विष्णु प्रणमामि परात्परम्।। सर्वेश्वरेश्वर विभो परमात्मन्नधोक्षज। हृषीकेश हृषीकेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते।। नृसिंहानन्त गोविन्द भूतभावन केशव। दुरूक्तं दुष्कृतं ध्यातं शमयाघं नमोऽस्तु ते।। यन्मया चिन्तितं दुष्टं स्वचित्तवशवर्तिना। अकार्यं महदत्युग्रं तच्छमं नय केशव।। बह्मण्यदेव गोविन्द परमार्थपरायण। जगन्नाथ जगद्धातः पापं प्रशमयाच्युत।। यथापराह्ने सायाह्ने मध्याह्ने च तथा निशि। कायेन मनसा वाचा कृतं पापमजानता।। जानता च हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव। नामत्रयोच्चारणतः पापं यातु मम क्षयम्।। शरीरं में हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव। पापं प्रशमयाद्य त्वं वाक्कृतं मम माधव।। यद् भुंजन् यत् स्वपंस्तिष्ठन् गच्छन् जाग्रद यदास्थितः। कृतवान् पापमद्याहं कायेन मनसा गिरा।। यत् स्वल्पमपि यत् स्थूलं कुयोनिनरकावहम्। तद् यातु प्रशमं सर्वं वासुदेवानुकीर्तनात्।। परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं च यत्। तस्मिन् प्रकीर्तिते विष्णौ यत् पापं तत् प्रणश्यतु।। यत् प्राप्य न निवर्तन्ते गन्धस्पर्शादिवर्जितम्। सूरयस्तत् पदं विष्णोस्तत् सर्वं शमयत्वघम्।। (अग्नि पुराणः 172.2-98) माहात्म्यम् – पापप्रणाशनं स्तोत्रं यः पठेच्छृणुयादपि। शारीरैर्मानसैर्वाग्जैः कृतैः पापैः प्रमुच्यते।। सर्वपापग्रहादिभ्यो याति विष्णोः परं पदम्। तस्मात् पापे कृते जप्यं स्तोत्रं सर्वाघमर्दनम्।। प्रायश्चित्तमघौघानां स्तोत्रं व्रतकृते वरम्। प्रायश्चित्तैः स्तोत्रजपैर्व्रतैर्नश्यति पातकम्।। (अग्नि पुराणः 172.17-29) अर्थः पुष्कर बोलेः “सर्वव्यापी विष्णु को सदा नमस्कार है। श्री हरि विष्णु को नमस्कार है। मैं अपने चित्त में स्थित सर्वव्यापी, अहंकारशून्य श्रीहरि को नमस्कार करता हूँ। मैं अपने मानस में विराजमान अव्यक्त, अनन्त और अपराजित परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ। सबके पूजनीय, जन्म और मरण से रहित, प्रभावशाली श्रीविष्णु को नमस्कार है। विष्णु मेरे चित्त में निवास करते हैं, विष्णु मेरी बुद्धि में विराजमान हैं, विष्णु मेरे अहंकार में प्रतिष्ठित हैं और विष्णु मुझमें भी स्थित हैं। वे श्री विष्णु ही चराचर प्राणियों के कर्मों के रूप में स्थित हैं, उनके चिंतन से मेरे पाप का विनाश हो। जो ध्यान करने पर पापों का हरण करते हैं और भावना करने से स्वप्न में दर्शन देते हैं, इन्द्र के अनुज, शरणागतजनों का दुःख दूर करने वाले उन पापापहारी श्रीविष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ। मैं इस निराधार जगत में अज्ञानांधकार में डूबते हुए को हाथ का सहारा देने वाले परात्परस्वरूप श्रीविष्णु के सम्मुख नतमस्तक होता हूँ। सर्वेश्वरेश्वर प्रभो ! कमलनयन परमात्मन् ! हृषीकेश ! आपको नमस्कार है। इन्द्रियों के स्वामी श्रीविष्णो ! आपको नमस्कार है। नृसिंह ! अनन्तस्वरूप गोविन्द ! समस्त भूत-प्राणियों की सृष्टि करने वाले केशव ! मेरे द्वारा जो दुर्वचन कहा गया हो अथवा पापपूर्ण चिंतन किया गया हो, मेरे उस पाप का प्रशमन कीजिये, आपको नमस्कार है। केशव ! अपने मन के वश में होकर मैंने जो न करने योग्य अत्यंत उग्र पापपूर्ण चिंतन किया है, उसे शांत कीजिये। परमार्थपरायण, ब्राह्मणप्रिय गोविन्द ! अपनी मर्यादा से कभी च्युत न होने वाले जगन्नाथ ! जगत का भरण-पोषण करने वाले देवेश्वर ! मेरे पाप का विनाश कीजिये। मैंने मध्याह्न, अपराह्न, सायंकाल एवं रात्रि के समय जानते हुए अथवा अनजाने, शरीर, मन एवं वाणी के द्वारा जो पाप किया हो, ‘पुण्डरीकाक्ष’, ‘हृषीकेश’, ‘माधव’ – आपके इन तीन नामों के उच्चारण से मेरे वे सब पाप क्षीण हो जायें। कमलनयन ! लक्ष्मीपते ! इन्द्रियों के स्वामी माधव ! आज आप मेरे शरीर एवं वाणी द्वारा किये हुए पापों का हनन कीजिये। आज मैंने खाते, सोते, खड़े, चलते अथवा जागते हुए मन, वाणी और शरीर से जो भी नीच योनि एवं नरक की प्राप्ति कराने वाले सूक्ष्म अथवा स्थूल पाप किये हों, भगवान वासुदेव के नामोच्चारण से वे सब विनष्ट हो जायें। जो परब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, उन श्रीविष्णु के संकीर्तन से मेरे पाप लुप्त हो जायें। जिसको प्राप्त होकर ज्ञानीजन पुनः लौटकर नहीं आते, जो गंध, स्पर्श आदि तन्मात्राओं से रहित है, श्रीविष्णु का वह परम पद मेरे सम्पूर्ण पापों का शमन करे।” माहात्म्यः जो मनुष्य पापों का विनाश करने वाले इस स्तोत्र का पठन अथवा श्रवण करता है, वह शरीर, मन और वाणीजनित समस्त पापों से छूट जाता है एवं समस्त पापग्रहों से मुक्त होकर श्रीविष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। इसलिए किसी भी पाप के हो जाने पर इस स्तोत्र का जप करें। यह स्तोत्र पापसमूहों के प्रायश्चित के समान है। कृच्छ्र आदि व्रत करने वाले के लिए भी यह श्रेष्ठ है। स्तोत्र-जप और व्रतरूप प्रायश्चित से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए इनका अनुष्ठान करना चाहिए।
ज्योतिष झरोखा -जन्म कुंडली
*☆☆ ज्योतिष-झरोखा -*
*★★ जन्म-कुण्डली*
•• आपकी जन्म-कुण्डली आपका बैंक लॉकर है - जो आपके जन्म से आपके नाम है । इस बैंक लॉकर में आपके पूर्व जन्मों की कर्म-सम्पति रखी है । इसी सम्पति से आपका जीवन आरम्भ होता है । आपकी कुण्डली के योग - आपके लॉकर की कर्म-संपति का ब्याज है । जो अशुभ योगों के कारण आपकी कर्म संपति से काट लिया जाता है । ऐसे ही शुभ योगों के कारण आपकी कर्म-सम्पति में ये ब्याज जोड़ दिया जाता है । इससे आपका जीवन-चक्र सुख-दुख के प्रतिशत को प्रकट करता है ।
महा-दशायें और अन्तर्दशायें आपकी कर्म-सम्पति की FD, Fix-Deposit है । महादशायें बड़ी FD है और अन्तर्दशायें छोटी FD है । अशुभ और निर्बल ग्रहों की दशायें आपकी FD को Matured परिपक्व नहीं होने देती है । जिससे आपके जीवन के कार्य बनते- बनते रुक जाते हैं । ऐसे ही शुभ और बलवान ग्रहों की दशायें आपकी FD को परिपक्व कर देती है । जिससे आप सफलता की दिशा में अग्रसर रहते है । इससे आपके जीवन-चक्र का समय-समय पर मूल्यांकन होता रहता हैं ।
गोचर के ग्रह - आपकी कर्म-सम्पति के लिये शुभ-अशुभ सन्देश लेकर आते हैं । जैसे - किसी बैंक के लिये सरकारी नियम - कभी अच्छे और कभी बुरे ।
ये कभी आपके लाकर पर अच्छा-बुरा प्रभाव डालते हैं । कभी आपके ब्याज को कम ज्यादा कर देते हैं और कभी आपकी FD को प्रभावित करते हैं । ये सब इनके सन्देश पर निर्भर करता है कि - वो किस पर प्रभाव डालेंगे । इससे आपके जीवन के छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव निश्चित होते है ।
रवि प्रदोष व्रत
*रवि प्रदोष व्रत का फल*
भगवान शिव, माता पार्वती संग प्रत्यक्ष देवता सूर्य देव का आशीर्वाद दिलाने वाला रवि प्रदोष व्रत साधक को सुख-समृद्धि के साथ आरोग्य और लंबी आयु का आशीर्वाद दिलाने वाला है. इस व्रत को करने वाला व्यक्ति रोग-शोक आदि से मुक्त रहता है. दाम्पत्य सुख पाने के लिए भी ये व्रत अत्यंत शुभ माना जाता है.
*रवि प्रदोष व्रत की पूजन की विधि*
भगवान शिव और माता पार्वती के साथ सूर्य देव का आशीर्वाद पाने के लिए रविवार के दिन पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि पर सूर्योदय से पहले यानी ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाएं. इसके बाद स्नान-ध्यान आदि करके उगते सूर्य को तांबे के पात्र में जल, रोली और अक्षत डालकर अर्घ्य दें. इसके बाद भगवान शिव और पार्वती का ध्यान करके इस व्रत को विधि-विधान से पूरा करने का संकल्प करें. पूरे दिन नियम और संयम के साथ व्रत करने के बाद शाम के समय एक बार फिर से स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें. स्नान के बाद भगवान शिव की बिल्ब पत्र, कमल या फिर दूसरे किसी पुष्प जो उपलब्ध हो और धतूरे के फल आदि के साथ पूजा करें. भगवान शिव संग माता पार्वती की पूजा करना बिल्कुल न भूलें. पूजन के बाद रुद्राक्ष की माला से 'ॐ नम: शिवाय' मंत्र का कम से कम एक माला जप करें. पूजन के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करके सभी को प्रसाद बांटें. किसी ब्राह्मण को अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन और दक्षिणा आदि का दान दें
*क्या करे रवि प्रदोष व्रत के दिन*
👉प्रदोष व्रत की शाम शनिदेव को अपराजिता का नीले रंग का फूल चढ़ाएं. मान्यता के अनुसार यह उपाय सभी समस्याओं का अंत कर देता है. यह फूल शनिदेव को पसंद है, इसलिए इसे अर्पित करने से शनिदेव के प्रसन्न होने की मान्यता है.
👉इस व्रत में दिन ढल जाने पर अपराजिता का फूल अपने हाथ में लेकर शनिदेव से अपनी परेशानी बताएं. फिर उस फूल को बहते पानी में बहा दें. अगर पानी में बहा न सकें तो मिट्टी में उस फूल को दबा दें. यह बहुत प्रभावशाली उपाय माना जा
👉प्रदोष व्रत की शाम काली गाय को या काले कुत्ते को रोटी खिलाएं. अगर काला कुत्ता न मिले तो किसी भी कुत्ते को रोटी खिलाई जा सकती है. इससे भी संकट से मुक्ति की मान्यता है.
👉इस दिन बरगद के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं वहां बैठकर शनिदेव के मंत्र ‘ओम प्रां प्रीं प्रों सः शनिचराय नमः’ या फिर ‘ओम शं शनैश्चराय नमः का जाप करें.’
👉प्रदोष व्रत की शाम शनिदेव की प्रतिमा के समक्ष बैठकर सुंदरकांड का पाठ करें. पाठ करने के बाद “नीलांजन समाभासं रवि पुत्रां यमाग्रजं। छाया मार्तण्डसंभूतं तं नामामि शनैश्चरम्।।” मंत्र का जाप करें.
👉प्रदोष व्रत की रात को किए गए उपायों से शनिदेव बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं, इस रात बरगद के पेड़ की जड़ के पास चौमुखा दीपक जलाने से भगवान शनिदेव अपनी कृपा बनाए रखते हैं, इससे साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है.
👉प्रदोष व्रत की शाम कुष्ठरोगियों को काली वस्तुओं का दान करें. काली वस्तुओं में काला कपड़ा, काला बैग, काली चप्पल, काली घड़ी या काले गमछे का दान दिया जा सकता है, इसके अलावा काली मिठाई या पेय पदार्थ भी दान किया जा सकता है.
*📖रवि प्रदोष कथा📖*
✍एक गांव में अति दीन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी साध्वी स्त्री प्रदोष व्रत किया करती थी। उसे एक ही पुत्ररत्न था। एक समय की बात है, वह पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में चोरों ने उसे घेर लिया और वे कहने लगे कि हम तुम्हें मारेंगे नहीं, तुम अपने पिता के गुप्त धन के बारे में हमें बतला दो।
बालक दीनभाव से कहने लगा कि बंधुओं! हम अत्यंत दु:खी दीन हैं। हमारे पास धन कहां है?
तब चोरों ने कहा कि तेरे इस पोटली में क्या बंधा है?
बालक ने नि:संकोच कहा कि मेरी मां ने मेरे लिए रोटियां दी हैं।
यह सुनकर चोरों ने अपने साथियों से कहा कि साथियों! यह बहुत ही दीन-दु:खी मनुष्य है अत: हम किसी और को लूटेंगे। इतना कहकर चोरों ने उस बालक को जाने दिया।
बालक वहां से चलते हुए एक नगर में पहुंचा। नगर के पास एक बरगद का पेड़ था। वह बालक उसी बरगद के वृक्ष की छाया में सो गया। उसी समय उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उस बरगद के वृक्ष के पास पहुंचे और बालक को चोर समझकर बंदी बना राजा के पास ले गए। राजा ने उसे कारावास में बंद करने का आदेश दिया।
ब्राह्मणी का लड़का जब घर नहीं लौटा, तब उसे अपने पुत्र की बड़ी चिंता हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया और भगवान शंकर से मन-ही-मन अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी।
भगवान शंकर ने उस ब्राह्मणी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसी रात भगवान शंकर ने उस राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि वह बालक चोर नहीं है, उसे प्रात:काल छोड़ दें अन्यथा उसका सारा राज्य-वैभव नष्ट हो जाएगा।
प्रात:काल राजा ने शिवजी की आज्ञानुसार उस बालक को कारावास से मुक्त कर दिया। बालक ने अपनी सारी कहानी राजा को सुनाई।
सारा वृत्तांत सुनकर राजा ने अपने सिपाहियों को उस बालक के घर भेजा और उसके माता-पिता को राजदरबार में बुलाया। उसके माता-पिता बहुत ही भयभीत थे। राजा ने उन्हें भयभीत देखकर कहा कि आप भयभीत न हो। आपका बालक निर्दोष है। राजा ने ब्राह्मण को 5 गांव दान में दिए जिससे कि वे सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें। भगवान शिव की कृपा से ब्राह्मण परिवार आनंद से रहने लगा।
*अत:-* जो भी मनुष्य रवि प्रदोष व्रत को करता है, वह सुखपूर्वक और निरोगी होकर अपना पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।
प्रहलाद जानी
लगभग 80 सालो से बिना अन्न और जल के जिंदा है प्रह्लाद जानी
जब DRDO और आर्मी के डॉक्टर को इनके बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने इन्हें 30 दिन तक एक कमरे में बंद रखा तथा कमरे में कैमरे लगाकर रखे। वैज्ञानिक और डॉक्टर हैरान थे कि प्रह्लाद जानी ने 30 दिन तक कुछ नही खाया-पिया।
फिर इनके खून की जांच की गयी तो उसमें भी हीमोग्लोबिन सामान्य मिला।
अब तक देश-विदेश के कई डॉक्टर इन पर शोध कर चुके है मगर किसी को कुछ हासिल नही हुआ।
प्रह्लाद जानी के अनुसार ये भगवान श्रीनाथ(कृष्ण) की पूजा बचपन मे करते थे। जब ये 9 साल के थे तब एक दिन पूजा में इन्हें माँ काली ने दर्शन दिए थे और वरदान मांगने को कहा था। तब इन्होंने भूंख प्यास से मुक्ति मांगी थी।। भगवती ने इनके तालु में उंगली रख दी थी तब से लेकर आजतक इनकी तालु से अमृत गिरता है और उन्हें भूंख प्यास नही लगती।
गुजरात के काठियावाडा में रहने वाले प्रह्लाद जानी पर नास्तिक और आर्य समाजी भी खामोश है। अम्बेडकवादी भी चुप्पी साधे बैठे है।। मगर डॉक्टर और वैज्ञानिकों ने प्रह्लाद जानी के दावे पर कई बार मोहर लगाते हुए उसे चमत्कार घोषित किया है।
चमत्कार तो हर युग मे होते है। मगर वर्तमान उन्हें उपेक्षित करता है और भविष्य उन्हें अंधविश्वास कहता है।
चौदह प्राचीन हिन्दु परंपराऐ
चौदह प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े लाभ!!!!
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1. एक ही गोत्र में शादी नहीं करना : - कई शोधों में ये बात सामने आई है कि व्यक्ति को जेनेटिक बीमारी न हो इसके लिए एक इलाज है ‘सेपरेशन ऑफ़ जींस’, यानी अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नहीं करना चाहिए। रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाते हैं और जींस से संबंधित बीमारियां जैसे कलर ब्लाईंडनेस आदि होने की संभावनाएं रहती हैं। संभवत: पुराने समय में ही जींस और डीएनए के बारे खोज कर ली गई थी और इसी कारण एक गोत्र में विवाह न करने की परंपरा बनाई गई।
2. कान छिदवाने की परंपरा : - स्त्री और पुरुषों, दोनों के लिए पुराने समय से ही कान छिदवाने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, आज पुरुष वर्ग में ये परंपरा मानने वालों की संख्या काफी कम हो गई है। इस परंपरा की वैज्ञानिक मानयता ये है कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है, बोली अच्छी होती है। कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित और व्यवस्थित रहता है। कान छिदवाने से एक्यूपंक्चर से होने वाले स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे छोटे बच्चों को नजर भी नहीं लगती है।
3. माथे पर तिलक लगाना : - स्त्री और पुरुष माथे पर कुमकुम, चंदन का तिलक लगाते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इसी चक्र स्थान पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर तिलक लगाने से हमारी एकाग्रता बढ़ती है। मन बेकार की बातों में उलझता नहीं है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे का जो दबाव बनता है, उससे माथे तक जाने वाली नसों का रक्त संचार व्यवस्थित होता है। रक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं।
4. जमीन पर बैठकर भोजन करना : - जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन तंत्र और पेट के लिए बहुत फायदेमंद है। पालथी मारकर बैठना एक योग आसन है। इस अवस्था में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। पालथी मारकर भोजन करते समय दिमाग से एक संकेत पेट तक जाता है कि पेट भोजन ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाए। इस आसन में बैठने से गैस, कब्ज, अपच जैसी समस्याएं दूर रहती हैं।
5. हाथ जोड़कर नमस्ते करना : - हम जब भी किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते या नमस्कार करते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है नमस्ते करते समय सभी उंगलियों के शीर्ष आपस में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। हाथों की उंगलियों की नसों का संबंध शरीर के सभी प्रमुख अंगों से होता है। इस कारण उंगलियों पर दबाव पड़ता है तो इस एक्यूप्रेशर (दबाव) का सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है।साथ ही, नमस्ते करने से सामने वाला व्यक्ति हम लंबे समय तक याद रह पाता है। इस संबंध में एक अन्य तर्क यह है कि जब हम हाथ मिलाकर अभिवादन करते है तो सामने वाले व्यक्ति के कीटाणु हम तक पहुंच सकते हैं। जबकि नमस्ते करने पर एक-दूसरे का शारीरिक रूप से संपर्क नहीं हो पाता है और बीमारी फैलाने वाले वायरस हम तक पहुंच नहीं पाते हैं।
6. भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से : - धार्मिक कार्यक्रमों में भोजन की शुरुआत अक्सर मिर्च-मसाले वाले व्यंजन से होती है और भोजन का अंत मिठाई से होता है। इसका वैज्ञानिक तर्क यह है कि तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।
7. पीपल की पूजा : - आमतौर पर लोगों की मान्यता यह है कि पीपल की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसका एक तर्क यह है कि इसकी पूजा इसलिए की जाती है, ताकि हम वृक्षों की सुरक्षा और देखभाल करें और वृक्षों का सम्मान करें, उन्हें काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा वृक्ष है, जो रात में भी ऑक्सीजन छोड़ता है। इसीलिए अन्य वृक्षों की अपेक्षा इसका महत्व काफी अधिक बताया गया है।
8. दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना : -
दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोने पर बुरे सपने आते हैं। इसीलिए उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक तर्क ये है कि जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर प्रवाहित होने लगता है। इससे दिमाग से संबंधित कोई बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर भी असंतुतित हो सकता है। दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से ये परेशानियां नहीं होती हैं।
9. सूर्य की पूजा करना : - सुबह सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क ये है कि जल चढ़ाते समय पानी से आने वाली सूर्य की किरणें, जब आंखों हमारी में पहुंचती हैं तो आंखों की रोशनी अच्छी होती है। साथ ही, सुबह-सुबह की धूप भी हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होती है। शास्त्रों की मान्यता है कि सूर्य को जल चढ़ाने से घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान मिलता है। कुंडली में सूर्य के अशुभ फल खत्म होते हैं।
10. चोटी रखना : - पुराने समय में सभी ऋषि-मुनी सिर पर चोटी रखते थे। आज भी कई लोग रखते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि जिस जगह पर चोटी रखी जाती है, उस जगह दिमाग की सारी नसों का केंद्र होता है। यहां चोटी रहती है तो दिमाग स्थिर रहता है। क्रोध नहीं आता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। मानसिक मजबूती मिलती है और एकाग्रता बढ़ती है।
11. व्रत रखना : - पूजा-पाठ, त्योहार या एकादशियों पर लोग व्रत रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से पाचनतंत्र को आराम मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी, मधुमेह आदि रोग होने की संभावनाएं भी कम रहती हैं।
12. चरण स्पर्श करना : - किसी बड़े व्यक्ति से मिलते समय उसके चरण स्पर्श करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। यही संस्कार बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे भी बड़ों का आदर करें। इस परंपरा के संबंध में मान्यता है कि मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हमारे हाथों से सामने वाले पैरों तक पहुंचती है और बड़े व्यक्ति के पैरों से होते हुए उसके हाथों तक पहुंचती है। आशीर्वाद देते समय व्यक्ति चरण छूने वाले के सिर पर अपना हाथ रखता है, इससे हाथों से वह ऊर्जा पुन: हमारे मस्तिष्क तक पहुंचती है। इससे ऊर्जा का एक चक्र पूरा होता है।
13. मांग में सिंदूर लगाना : - विवाहित महिलाओं के लिए मांग में सिंदूर लगाना अनिवार्य परंपरा है। इस संबंध में तर्क यह है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी (पारा- तरल धातु) होता है। इन तीनों का मिश्रण शरीर के ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। इससे मानसिक तनाव भी कम होता है।
14. तुलसी की पूजा : - तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। शांति रहती है। इसका तर्क यह है कि तुलसी के संपर्क से हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। यदि घर में तुलसी होगी तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे कई बीमारियां दूर रहती है
हरितालिका तीज व्रत पूजा विधि
*हरतालिका तीज (गौरी तृतीया) व्रत कल जानिए पूजा विधि ब्रत कथा एवं समस्त विधि-*
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हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं। यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता हैं।
यह आमतौर पर अगस्त – सितम्बर के महीने में ही आती है. इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहते है। भगवान शिव और पार्वती को समर्पित इस व्रत को लेकर इस बार उलझन की स्थिति बनी हुई है। व्रत करने वाले इस उलझन में हैं कि उन्हें किस दिन यह व्रत करना चाहिए। इस उलझन की वजह यह है कि इस साल पंचांग की गणना के अनुसार तृतीया तिथि का क्षय हो गया है यानी पंचांग में तृतीया तिथि का मान ही नहीं है।
आपको बता दें कि इस विषय पर ना सिर्फ व्रती बल्कि ज्योतिषशास्त्री और पंचांग के जानकर भी दो भागों में बंटे हुए हैं। एक मत के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत २१ अगस्त को करना शास्त्र सम्मत होगा क्योंकि यह व्रत हस्त नक्षत्र में किया जाता है जो २१ अगस्त को है। २१ अगस्त को ११:०२ए एम मिनट तक तृतीया तिथि होगी। *जिससे व्रत के लिए २१ सितंबर का दिन ही सब प्रकार से उचित है।*
*२० अगस्त को द्वितीया तिथि ०२ बजकर १३ मिनट पर समाप्त हो जाएगी। इसके बाद से तृतीया यानी तीज शुरू हो जाएगी और अगले दिन यानी २१ अगस्त को से ११ बजकर ०२ मिनट पर तृतीया समाप्त होकर चतुर्थी शुरू हो जाएगी।*
खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं। कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।
विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है, वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है।
हरतालिका तीज में *भगवान शिव, माता गौरी एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं।* यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।
*महिलाओं में संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत*
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हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है।इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है। संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियोंका सामोहिक निश्चय है।इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें ।संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।
अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है। इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है ।घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ एवं इच्छाओं का सम्मान करें,उनका विश्वास बढाएं,ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।
*हरतालिका तीज व्रत पूजा विधि और नियम*
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हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।
विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।
उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।
इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।
प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
*भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए-*
ऊं उमायै नम:
ऊं पार्वत्यै नम:
ऊं जगद्धात्र्यै नम:
ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:
ऊं शांतिरूपिण्यै नम:
ऊं शिवायै नम:
*भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए-*
ऊं हराय नम:
ऊं महेश्वराय नम:
ऊं शम्भवे नम:
ऊं शूलपाणये नम:
ऊं पिनाकवृषे नम:
ऊं शिवाय नम:
ऊं पशुपतये नम:
ऊं महादेवाय नम:
निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।
*हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री*
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०१- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।
०२- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।
०३- केले का पत्ता।
०४- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।
०५- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।
०६- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।
०७- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
०८- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।
०९- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।
*हरतालिका तीज व्रत कथा*
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भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।
श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।
तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।
नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।
नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।
तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।
उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।
तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।
इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।
तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।
तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।
तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।
गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।
हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।
*हरतालिका तीज व्रत पूजा विधि*
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हरतालिका तीज प्रदोषकाल में किया जाता है। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। यह दिन और रात के मिलन का समय होता है।
हरतालिका पूजन के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू रेत व काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाएं।
पूजा स्थल को फूलों से सजाकर एक चौकी रखें और उस चौकी पर केले के पत्ते रखकर भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।
इसके बाद देवताओं का आह्वान करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें।
सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तु रखकर माता पार्वती को चढ़ाना इस व्रत की मुख्य परंपरा है।
इसमें शिव जी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है। यह सुहाग सामग्री सास के चरण स्पर्श करने के बाद ब्राह्मणी और ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
इस प्रकार पूजन के बाद कथा सुनें और रात्रि जागरण करें। आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं व ककड़ी-हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें।
*हरितालका तीज पूजा मुहूर्त*
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हरितालिका पूजन प्रातःकाल ना करके प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त में किया जाना ही शास्त्रसम्मत है।
प्रदोषकाल निकालने के लिये आपके स्थानीय सूर्यास्त में आगे के ९६ मिनट जोड़ दें तो यह एक घंटे ३६ मिनट के लगभग का समय प्रदोष काल माना जाता है।
प्रदोष काल मुहूर्त : सायं ०६:४१ से रात्रि:०८:५८ तक पारण अगले दिन प्रातः काल ०८ बजकर ३४ मिनट के बाद करना उत्तम रहेगा।
श्री हरितालिका तीज पूजन आरती
*श्रीहरतालिका तीज पूजन आरती*
ध्यान
*ॐ मंदारमालाकुलितायकायै कपालमालांकितशेखराय ।*
*दिव्याम्बरायै च दिगम्बरायै नमः शिवायै च नमः शिवायै ।।*
श्रीपार्वती आवाहन
*ॐआगच्छ देवि सर्वेशे सर्वदेवैश्च संस्तुते ।*
*अतस्त्वां पूजयिष्यामि प्रसन्ना भव पार्वति ।।*
श्रीपार्वती स्थापना
*ॐउमायै पार्वत्यै शांति रूपिण्यै शिवायै ब्रह्मरूपिण्यै नमः ।*
श्रीशिव स्थापना
*ॐहराय महेश्वर शम्भवै शूलपाणयै ।*
*पिनाकवृषे शिवाय पशुपतये महादेवाय नमः ।।*
श्रीशिव की बालू रेत की मूर्ति श्रीगौरी की षोडशोपचार पूजन अभिषेक प्रदोष सायंकाल में करें ।
*श्रीपार्वती की आरती*
ॐजय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता ।
ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता ।।
अति कुल पद्म निवासी, निज सेवक त्राता। जग जीवन जगदंबा, हरि गुण को गाता ।।
सिंहन वाहन साजै, लुकड़ रहे साथा ।
देव वधू जहँ गावत, निरत करत साथा ।।
सतयुग रुप शील अति सुंदर, नाम सती कहलाता ।
हिमाचल घर जन्मी, सखियन संग राता ।।
शुम्भ निशुम्भ विदारै, हेमाचल स्थाता ।
सहस भुजा तनु धर के, चक्र लिया हाथा ।।
सृष्टि रुप तू ही जननी, शिव संग रंग राता
नंदी भृंगी वीन वही, परयो मद माता ।।
देवी अजर करत हम, वन चित्त कूं लाता ।
गावत दे दे ताली, मन में रंग छाता ।।
श्रीपार्वती मैया की आरती, जो कोई नर गाता ।
स्वर्ग सुखी नित रहना, सुख संपत्ति पाता ।।
*श्रीहरतालिका तीज रात्रि जागरण*
प्रदोष सायंकाल से सूर्योदय तक जागरण करने से श्रीगौरी का आशीर्वाद मिलता है ।
प्रथम प्रहर प्रदोष सायंकाल में नाम ले-
*ॐ श्री भव शर्व रुद्र पशुपति उग्र महान भीम ॐ ह्रीं ईशानाय नमः ।*
आरती करे।
दूसरा प्रहर रात्रि 9 बजे नाम ले-
*ॐ ह्रीं अघोराय नमः ।*
आरती करे।
तीसरा प्रहर निशीथ वेला रात्रि 12 बजे नाम ले-
*ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः ।*
आरती करे।
चौथा प्रहर रात्रि 4 से 5 बजे तक में नाम ले-
*ॐ ह्रीं सद्योजाताय नमः ।*
आरती करे ।
उषाकाल श्रीसूर्योदय से पहले नदी कुंआ तालाब आदि जलाशय में जाकर बालूरेत की मूर्ति आदि विसर्जित करने के पहले पूजन आरती कर विसर्जित कर घर आवे ।
श्रीहरतालिका तीज का व्रत करने से कुँवारी कन्याओं को वर की प्राप्ति एवं विवाहित महिलाओं को अखण्ड सौभाग्यवती होती हैं श्रीहरतालिका तीज पूजन प्रदोष काल सायं में करें केल पत्तों का मंडप बना रेशमी वस्त्र की झाँकी बनावे श्रीपार्वती को अर्पित सिंदूर से सुहागन अपना सुहाग श्रीपार्वती से ले। खीरा अथवा सादी ककड़ी का नैवेद्य लगा उस ककड़ी से अगले दिन पारण करे श्रीशिवपार्वती को पंचामृत स्नान करावे श्रीशिव को भंग धतूरा फल फूल सफेद आँकड़ा फूल बिल्वपत्र अन्य पत्ते भी अर्पित करे। श्रीपार्वती को सुहाग की वस्तएँ अर्पित करें । श्रीहरतालिका तीज का व्रत अगले दिन अर्थात् चौथ को ही पारण करें ।
*जय हो श्रीउमागौरी*
मोटापे से मुकति का जयोतिषिय उपाय
*मोटापे से मुक्ति के लिए एवं अपना वजन कम करने के ज्योतिषीय उपाय-*
व्यक्ति को मोटापा या शरीर का वजन बढ़ना ऊर्जा के सेवन और ऊर्जा के उपयोग के बीच असंतुलन के कारण व अधिक मोटापे से डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, गैस्ट्रोओस्फोजियल, रक्तचाप, हृदय रोग, डिप्रेशन, जोड़ों का दर्द, साँस लेने मे परेशानी, थायरॉइड, लीवर व प्रजनन संबंधी समस्याएं होती है।
ज्योतिष मे गुरु गृह मोटापे का मुख्य कारक ग्रह व राहु गृह अनाप-शनाप, तैलीय व गरिष्ठ भोजन करने की ओर प्रेरित करता है। जिससे मोटा होने के आसार काफी बढ़ जाते हैं।
*जिन व्यक्तिओ का डाइटिंग व योगा के बाद भी वजन कम नहीं हो रहा है। वो व्यक्ति किसी भी रविवार के दिन थोड़ा सा काला धागा अपनी अनामिका उंगली लपेटकर पर शुद्ध रांगे की धातु से बनी अंगूठी पहिन लें।*
कुछ ही दिनों मे मोटापा मे कमी व जंक फ़ूड खाने की आदत पर काफी कण्ट्रोल हो जाएगा। शरीर का जमा फैट कम होने लगेगा।
Thursday, June 18, 2020
शिव को गुरु बनाने की विधि
Friday, August 30, 2019
वासना को जड से समाप्त करे
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“ओम् नमो भगवते वासुदेवायः”
मनुष्य के चरित्र में कई नकारात्मक गुण होंते हैं लेकिन शायद इसमे किसी को कोई संदेह नही होगा कि काम वासना उनमे सबसे खतरनाक है| इसकी गंभीरता इससे भी बढ़ जाती है कि वासना अकेले दूसरे नकारात्मक गुणो को उत्पन्न करती है। इसलिए मनुष्य के लिए आत्म संयम तब तक संभव नही है कि जब तक काम वासना के ऊपर नियंत्रण न प्राप्त कर लिया जाए, क्योंकि अगर दूसरे दुर्गुणों जैसे क्रोध, अहंकार के ऊपर नियंत्रण कर भी लिया जाए और मन में वासना शेष रहे तो दूसरे दुर्गुण दुबारा उत्पन्न हो जायेंगे। आत्म संयम के लिए इस खतरनाक दुर्गुण वासना पर नियंत्रण आवश्यक है। वासना को जड़ से समाप्त करने लिए हमे इसके जड़ को जानना आवश्यक है।
वैसे काम शब्द का प्रयोग विस्तृत अर्थ में होता है, कोई मनुष्य के मन में अगर कोई भौतिक इक्षा हो तो वह भी काम की परिभाषा में ही आता है, लेकिन ईमानदारी से अपने अधिकार के अधीन अपनी इक्षा पूर्ति कभी गलत नही होता और लगभग सभी मनुष्यों में कोई न कोई इक्षा होती है| लेकिन यह काम जब किसी मनुष्य में लैंगिक वासना ,सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा या आसान धन बिना मिहनत किए की कामना में परिवर्तित हो जाए तो यह बहुत ही खतरनाक हो जाता है| इस प्रकार की मनः स्थिति में मनुष्य अपनी वासना की पूर्ति के लिए हमेशा विध्वंशकारी मार्ग का चयन करता है जिससे समाज की बहुत क्षति होती है।
*प्रकृति वासना का श्रोत है*
किसी में मन में वासना कहीं आसमान से नही टपक जाती बल्कि इसी प्रकृति से आती है| गलत जीवन पद्धति, गलत आदत और गलत शिक्षा से इस खतरनाक दुर्गुण का मनुष्य के मन में आगमन होता है। इस प्रकृति के सभी पदार्थ तीन गुणो से युक्त होते हैं । उन तीन गुणो में “रजस गुण” वासना का जन्म स्थान है। रजस गुणो से युक्त प्रकृति के वस्तुओं के संपर्क में आने से मनुष्य में वासना जैसे दुर्गुण का जन्म होता है।यह तथ्य स्पस्ट रूप से भगवान श्री कृष्ण के द्वारा वर्णित है:-
*श्रीभगवानुवाच*
*काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।*
*महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥*
भावार्थ : श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम और क्रोध है। यह (काम या वासना) कभी तृप्त नही होता और पाप युक्त है। ऐसा जान लो कि यह काम वासना मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
ऊपर के श्लोक में यह स्पस्ट विदित हैं कि वासना और क्रोध दोनों प्रकृति में स्थित रजस गुण से उत्पन्न होते है। जो मनुष्य राजसिक जीवन पद्धति अपनाते हैं उनमे वासना जैसे गुण के उत्तपन्न होने के अवसर ज्यादा होते हैं
तीन गुण सत्व, रजस और तमस प्रकृति के सभी पदार्थों में पाए जाते हैं, मनुष्य के भोजन से लेकर वस्त्र और यहाँ तक हवा पानी तक में इन गुणो का वास होता है। मनुष्य के कुछ कार्य कलाप जिन्हें रजस गुण से पहचाना जा सकता है इस प्रकार है।
मांसाहार,तीखे आदि भोजन
शराब, धूम्रपान, या ड्रग का सेवन उत्तेजित या कामुक माहौल या पदार्थों की संगती।
कृत्रिम आरामदायक वातावरण का अधिक उपयोग और प्रकृति वातावरण से दुरी।
शारीरक मेहनत, योग या व्यायाम की कमी।
भौतिक सुख की ओर ज्यादा रुझान।
भौतिकवाद विचारधारा का पालन
यह कुछ साधारण उदाहरण हैं जो राजसिक गुणो से युक्त जीवन पद्धति को पारिभाषित करते हैं| जो मनुष्य ऊपर उल्लेखित जीवन पद्धति में लिप्त होते हैं उनमे वासना उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है|
इस तथ्य का प्रतिपादन विज्ञान की विभिन्न धाराओं में भी किया गया है| मनोविज्ञान में सामाजिक जीवन का मनुष्य के ऊपर प्रभाव के बारे में विस्तृत वर्णन हैं जहाँ यह सिद्ध किया गया है कि आस पास के माहौल का पूरा प्रभाव मनुष्य के ऊपर पड़ता है| सामाजिक शास्त्र में इस इस प्रकार के सिद्धांत हैं| कई दूसरे शास्त्र, कवितायेँ और रचनाओं में इस तथ्य का वर्णन है| हममे से शायद ही कोई होगा जिसने यह पंक्ति नही पढ़ी हो:
“संगत से गुण होत है संगत से गुण जात”
यह कहावत तो गली गली में प्रचलित है|
बुरी संगत का असर बुरा ही होता है। ओर अच्छी संगत का असर अच्छी होती है।
वासना उत्पन्न कैसे होती है?
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वासना उत्पन्न होने का मूल कारण है सोच। सोच ही अच्छे या बुरे विचारो का आधार है। बुरे व नकरात्मक विचार ही वासना को जन्मदात्री है। यह तो ठीक है है प्रकृति में चारो ओर और हर पदार्थ में तीन गुणो का वास है और रजस गुण में वासना का वास होता है| लेकिन वातावरण से यह मनुष्य के मन तक कैसे आता है?
जब कोई मनुष्य रजस गुण से युक्त वातावरण जैसे अश्लील, कामुक, उत्तेजित, हिंसा युक्त वातावरण में रहता है वैसे कार्यों को देखता है, वैसे शब्दों को सुनता है और महसूस करता है तो उसकी इन्द्रियां, मन और बुद्धि उसमे लिप्त होते हैं| वह उन घटनाओं या उन पदार्थों के बारे में बार सोचता है जिससे उसके मन में उनके लिए इक्षा जागृत होती है, यह इक्षा जब एक हद से बढ़ जाती है तो यह वासना का रूप लेती है| यह तथ्य भी श्रीमद भगवद गीता में करुणामय भगवान के श्रीमुख से वर्णित
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥
भावार्थ : विषयों का(भौतिक पदार्थों) का लगातार चिन्तन करने से [वैसे मनुष्य की] उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना(वासना) उत्पन्न होती है और कामना(वासना) में विघ्न पड़ने से (कामना पूरी नही होने से) क्रोध उत्पन्न होता है॥
यह पूर्ण स्पस्ट है कि जब मनुष्य अश्लील, कामुक, उत्तेजना युक्त, हिंसा जैसे वातावरण में समय व्यतीत करता है, अपने इन्द्रियों और मन को को लिप्त करता है, तो उसमे वैसे भाव उत्पन्न होते हैं| वह उन अश्लील, कामुक, उत्तेजित यह हिंसा युक्त वस्तुओं या घटनाओं के बारे में सोचता है और उनमे फिर वैसे ही गुण आने लगते हैं| अगर समय रहते ऐसा मनुष्य खुद के ऊपर नियंत्रण नही करता और लगातार वैसे वातावरण में जाता है तो उसमे वासना(या उत्तेजन या हिंसा की भावना) उत्पन्न होगी ही| यह तो कोई भी बता सकता है कि अगर एक आदमी शराब खाना, जुआ खाना, या कोठे पर बैठा हो तो उसमे भक्ति के भाव तो नही ही आएंगे | शराबखाने में, जुयेखाने में, कोठे पर भगवान का भजन करने तो नही जाते लोग|
उपाय क्या है?
कारण तो बता ही दिया| अगर कोई इन्हें ईमानदारी से समझ ले तो उपाय भी खोज लेगा| कुछ उपायों को मैं यहाँ सारांश में वर्णित करता हूँ:
सबसे पहले तो हमे निराश नही होना चाहिये और सत्य को जानने का प्रयास करना चाहिये| इससे संबंधित सत्य यह है कि वासना, क्रोध आदि दुर्गुण प्रकृति कसे ही उत्पन्न होते है, चूँकि जीव का शरीर, मैं और बुद्धि इस प्रकृति के भाग हैं इसलिए काम(वासना) ही नही बल्कि प्रकृति के हर एक बदलाव का प्रभाव मनुष्य पर पडता है| एक खास जीवन पद्धति जिसमे रजस गुणो की प्रधानता हो जाती है तब वासना जैसे गुणो का जन्म होता है| अगर हम उस जीवन पद्धति को सही कर लें तो इन दुर्गुणों को बहुत आसानी से समाप्त किया ज सकता है|
रोकथाम ही उपाय है।
यह प्रक्रिया शारीरिक रोगों के संदर्भ सार्थक रूप से प्रयोग की जाती है| वासना भी तो शरीर और मानसिक रोग ही है और यह नियम यहाँ पर लागू होता है| जो मनुष्य यह चाहता है कि उसमे वासना जैसे दुर्गुण उत्पन्न न हों उसे वैसी जीवन पद्धति से बचना चाहिये जिसमें रजस गुणो की अधिकता हो| अश्लील, उत्तेजित आदि वातावरण से बचना चाहिये|
सात्विक जीवन पद्धति अपनाएं
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जो आत्म संयम के इक्षुक हैं और वासना जैसे गुणो कसे बचना चाहते हैं उन्हें अपने जीवन में सात्विक गुणो को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिये सात्विक गुणो के बढ़ने से रजस या तमस गुण अपने आप ही नियंत्रित हो जाते हैं| तीन गुणो का पूर्ण विवरण पहले दिया जा चूका है, औरु उनका विस्तृत विवरण तो यहाँ संभव नही है लेकिन सारांश में निन्म बातों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके सात्विक गुणो को बढ़ाया जा सकता है
१.अपनी नकारात्मक ओर तामसिक रुपी सोच पर नियंत्रण रखें।
२. इस सोच ओर कृत्य का विरोध करें।
३.आस -पास का वातावरण वासना रहित करने में अग्रसर हो। ४.बुरे लोगों की संगत से दूर रहे।
५. समाज, संस्थानों को बच्चों को इसके प्रति सजग रहने के लिए समुचित जानकारी प्रदान करने के प्रयत्न करने चाहिए।
६. आम नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
७. शुद्ध, ताजा और तुरंत पका हुआ भोजन करें।शराब, धूम्रपान पर नियंत्रण करें| ड्रग से बचें|
८. घर को यथा संभव साफ़ सुथरा रखने का प्रयास करे|
९. अगर संभव हो तो प्रकृति वातावरण में अधिक से अधिक समय बिताए| प्रातःकाल योग या व्यायाम करें।
१०. अपने खाने, काम करने और सोने की दिनचर्या तो दुरुस्त करें|
११. कुछ अपना कुछ समय ईश्वर साधना, मंत्रोचार या शास्त्रों के अध्ययन में लगाएं
१२. सप्ताह में एक दो बार अपने परिवार के साथ मदिंर अवश्य जाएँ| मदिर सात्विक गुणो से युक्त होते हैं और वहां पर बिताया गया थोडा समय भी बहुत लाभकारी होता है|
१३. सात्विक गुण से युक्त मनुष्यों का साथ करें
१४. जीवन से कुछ समय निकालकर गरीबों, असहायों की सेवा करने का प्रयास करें| सेवा वह अमृत है जो अन्तःकरण को शुद्ध करता है और इससे अपार संतुष्टि एवं शांति प्राप्त होती है|
१५. अपने माता पिता, गुरु जन, ज्ञानी या अग्रजों का सम्मान करें| इससे मन शुद्ध एवं शांत होता है
और भी कई उपाय हैं जिसका पालन करके सात्विक गुणो में वृद्धि की जा सकती है| जो आत्म संयम के इक्षुक हंह उन्हें सात्विक गुणो में वृद्धि करने का प्रयास करना चाहिये|
2. जीवन में सकारात्मक विकल्पों का लक्ष्य बनायें
कभी कभी जीवन के लक्ष्य का सही निर्धारण नही होने से मनुष्य गलत आदतों के आदि हो जाते हैं| निराशा अपने आप में एक खतरनाक मनःस्थिति है और निराशा की स्थिति में मनुष्य बहुत कमजोर होता है और वह किसी भी दुर्गुण का शिकार हो सकता है|
हम यह जानते हैं कि सभी मनुष्य एक समान सक्षम नही होते है| एक जहाज पर सभी कैप्टेन तो नही हो सकते लेकिन फिर हर एक के लिए कुछ न कुछ करने को होता है, हम छोटे बड़े सभी रूप में अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं, समाज को कुछ न कुछ दे सकते हैं|
एक महान कवि कहा
अगर तुम एक पर्वत की चीड का पेड़ नही बन सकते
तो घाटी की एक झाडी ही बन जाओ
लेकिन बनो तो नदी किनारे की सबसे सुदर झाडी
अगर एक पेड़ नही बन सकते तो एक झाडी का छल्ला बन जाओ
अगर एक झाडी का छल्ला भी नही बन सकते तो एक घास ही बन जाओ
अगर मस्की(बड़ी मछली) नही बन सकते तो बास(एक छोटी मछली) बन जाओ
लेकिन बनो तो झील की सबसे सजीव मछली
...
...
बात आकार की नही , सफलता या विफलता की नही
तुम जो भी हो उसे श्रेष्ठ करो
बात इसकी नही की हम बहुत बड़ा या छोटा करते है, बल्कि यह कि हम अपने जीवन को कितना सार्थक कर पाते हैं खुद के लिए और समाज के लिए| इन सब बुराइयों का सामना करने के लिए हम सब को भी प्रयत्न करना चाहिए। यह केवल देश ,समाज की ही जिम्मेदारी नहीं है, हमें भी अपनी कर्तव्य समझकर देश समाज का हिस्सा होने का परिचय देना होगा।
इस संसार में सबके लिए करने के लिए कुछ न कुछ अवश्य होता है|
हम सब को अपने जीवन का लक्ष्य तय करने का प्रयास करना चाहिये| खाली समय में अच्छे शौक जैसे संगीत, कला, खेल,समाज सेवा जैसे कार्यों को अपनाना चाहिये| और अगर कुछ नही मिलता तो हम अपने माता पिता, दादा दादी के कार्यों में हाथ बटा सकते हैं| कई ऐसे सकारात्मक कार्य है जो मनुष्य के जीवन को सुंदर, सुखी और शांत बना सकते हैं| कहने का अर्थ है कि हमे जीवन से निराशा को दूर करने के प्रयास करना चाहिये और अच्छी आदतों को धारण करने का प्रयास करना चाहिये| अच्छे गुणों से आत्म संयम स्वतः ही प्राप्त होता है|
आत्म संयम मनुष्य के सुख का आधार है और सभी मनुष्यों को किसी न किसी प्रकार से अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिये| अनियंत्रित चरित्र में दुर्गुणों का आगमन कभी भी हो सकता है|
आत्म संयम के कई पहलू हैं यहाँ पर हमने सिर्फ एक पहलू की बात की आगे के विवेचनो में दूसरे तथ्यों पर चर्चा करेंगे|
आशा है यह लेख उपयोगी होगा
“श्री हरि ओम् तत् सत्”
